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बृहस्पतिवार व्रत कथा – सुख, समृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए संपूर्ण कथा एवं विधि

बृहस्पतिवार व्रत कथा | brihaspativar vrat katha

बृहस्पतिवार व्रत कथा | गुरुवार का व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन में सुख, समृद्धि, धन, विद्या और उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। यहाँ बृहस्पतिवार व्रत की प्रामाणिक कथा और पूजा के नियम दिए गए हैं:

बृहस्पति व्रत कथा का महत्व (Significance of Brihaspati Vrat Katha)

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त सच्ची श्रद्धा से गुरुवार का व्रत रखते हैं और बृहस्पतिवार व्रत कथा पढ़ते या सुनते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और आलस्य से धन का नाश होता है, जबकि दान-पुण्य और भक्ति से दरिद्रता भी दूर हो जाती है।

बृहस्पतिवार व्रत कथा – Brihaspativar vrat katha

राजा का अहंकार और रानी की भूल

प्राचीन समय में एक प्रतापी और दानवीर राजा था। वह हर गुरुवार को व्रत और पूजा करता था। लेकिन उसकी रानी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। वह न तो व्रत रखती और न ही किसी को दान देती थी। वह राजा को भी दान करने से मना करती थी।

एक बार जब राजा शिकार पर गए थे, तब गुरु बृहस्पति साधु का रूप धारण कर भिक्षा मांगने आए। रानी ने साधु से कहा— “हे महाराज, मैं इस दान-पुण्य से तंग आ चुकी हूँ। मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे यह सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं।”

साधु का उपदेश और धन का विनाश

साधु रूपी बृहस्पति देव ने आश्चर्य से कहा, “देवी, धन और संतान को कौन बुरा मानता है? अगर तुम्हारे पास अधिक धन है, तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ।” लेकिन रानी नहीं मानी और अपनी जिद पर अड़ी रही। तब साधु ने कहा, “जैसी तुम्हारी इच्छा! आज से तुम घर लीपते समय गोबर से लीपना, अपने बाल पीले मिट्टी से धोना, गुरुवार को बाल कटवाना और कपड़े धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।” यह कहकर साधु अंतर्ध्यान हो गए।

रानी ने वैसा ही किया और केवल तीन गुरुवार बीतते-बीतते राजा का सारा राज-पाठ और धन नष्ट हो गया। परिवार दाने-दाने को तरसने लगा। विवश होकर राजा परदेस चला गया और वहां लकड़ी काटकर अपना जीवन व्यतीत करने लगा।

दासी की भक्ति और बृहस्पति देव की कृपा – गुरुवार व्रत कथा

घर पर रानी और उसकी दासी भूखी रहने लगीं। एक दिन रानी ने दासी को अपनी अमीर बहन के पास मदद मांगने भेजा। उस समय रानी की बहन कथा सुन रही थी, इसलिए उसने दासी को कोई उत्तर नहीं दिया। दासी ने लौटकर सारी बात रानी को बताई।

बाद में, रानी की बहन स्वयं आई और अपनी चुप्पी का कारण बताया। उसने रानी को बृहस्पति व्रत करने की सलाह दी। जब दासी ने घर के अंदर जाकर देखा, तो बृहस्पति देव की कृपा से एक घड़ा अनाज से भरा मिला। इसके बाद रानी और दासी ने नियमपूर्वक व्रत रखना और कथा सुनना शुरू किया। उनकी श्रद्धा देखकर भगवान प्रसन्न हुए और उन्हें पुनः धन-धान्य से संपन्न कर दिया।

बृहस्पतिवार व्रत कथा | brihaspativar vrat katha

राजा की घर वापसी और संतान प्राप्ति

इधर, परदेस में दुखी राजा को भी बृहस्पति देव ने साधु वेश में दर्शन दिए। उन्होंने राजा को व्रत की विधि बताई। राजा ने गुरुवार का व्रत किया, जिससे उसे न केवल अधिक धन मिला, बल्कि वह ससम्मान अपने नगर वापस लौटा।

अंत में, राजा और रानी ने मिलकर संतान प्राप्ति की कामना के साथ व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। देवगुरु बृहस्पति ने उनके जीवन के सभी कष्ट हर लिए।

गुरुवार व्रत पूजा विधि (Brihaspati Vrat Puja Vidhi)

  • स्नान और वस्त्र: गुरुवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
  • पूजा स्थल: घर के मंदिर में या केले के पेड़ के पास पूजा की व्यवस्था करें। भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की प्रतिमा स्थापित करें।
  • सामग्री अर्पण: पूजा में चने की दाल, गुड़, मुनक्का, हल्दी और पीले फूल अर्पित करें। केले के वृक्ष की जड़ में हल्दी मिला हुआ जल, चने की दाल और गुड़ अवश्य चढ़ाएं।
  • दीपक और कथा: शुद्ध घी का दीपक जलाएं और ऊपर दी गई व्रत कथा को पूरी श्रद्धा के साथ पढ़ें या सुनें।
  • आरती: कथा के पश्चात् बृहस्पति देव और भगवान विष्णु की आरती करें।
  • भोजन: इस दिन केवल एक समय भोजन किया जाता है। भोजन में पीली वस्तुओं का ही सेवन करें (जैसे बेसन के लड्डू, चने की दाल)। व्रत में नमक का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।

व्रत के महत्वपूर्ण नियम (क्या न करें)

  • बाल और नाखून न काटें: गुरुवार के दिन बाल कटवाना, दाढ़ी बनाना या नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता।
  • साबुन का प्रयोग वर्जित: इस दिन कपड़े नहीं धोने चाहिए और न ही स्नान करते समय साबुन या शैंपू का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • सात्विकता: पूरे दिन मन, कर्म और वचन से सात्विकता बनाए रखें।

“बोलो श्री बृहस्पति भगवान की जय! श्री विष्णु भगवान की जय!”

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