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राकेश शर्मा: भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री की पूरी कहानी और जीवनी (Rakesh Sharma Biography in Hindi)

राकेश शर्मा जीवनी | Rakesh Sharma Biography in Hindi

राकेश शर्मा जीवनी |अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण के क्षेत्र में भारत ने आज जो मुकाम हासिल किया है, उसकी नींव कई दशकों पहले रखी जा चुकी थी। लेकिन भारतवासियों के लिए वह क्षण सबसे ज्यादा गर्व का था, जब किसी भारतीय ने पहली बार अंतरिक्ष में कदम रखा था। राकेश शर्मा (Rakesh Sharma), भारत के प्रथम और विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने 2 अप्रैल 1984 को अंतरिक्ष में उड़ान भरकर इतिहास रच दिया था।

यह लेख पूरी तरह से विंग कमांडर राकेश शर्मा की प्रेरणादायक जीवन यात्रा, उनके अंतरिक्ष मिशन, और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों पर आधारित है। यदि आप भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो यह विस्तृत जीवनी आपके लिए ही है।

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राकेश शर्मा जन्म, परिवार और प्रारंभिक शिक्षा (Early Life and Education)

राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी, 1949 को पंजाब राज्य के पटियाला शहर में एक साधारण हिन्दू गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन से ही आसमान में उड़ते विमानों को देखने की लालसा ने उनके भीतर एक पायलट बनने का सपना जगा दिया था।

  • प्रारंभिक शिक्षा: उनकी शुरुआती पढ़ाई और सैनिक शिक्षा मुख्य रूप से हैदराबाद, तेलंगाना में हुई।
  • उच्च शिक्षा: उन्होंने हैदराबाद के सेंट जॉर्ज ग्रामर स्कूल से अपनी स्कूलिंग पूरी की और इसके बाद उस्मानिया विश्वविद्यालय (निज़ाम कॉलेज) से स्नातक की पढ़ाई की।
  • सपना: बचपन से ही उनका एक ही लक्ष्य था – भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) में शामिल होकर देश की सेवा करना और आसमान की ऊंचाइयों को छूना।

भारतीय वायुसेना में प्रवेश और करियर (Career in Indian Air Force)

राकेश शर्मा का आसमान में उड़ने का सपना तब साकार हुआ जब उन्होंने ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी’ (NDA – National Defence Academy) पुणे में प्रवेश लिया।

  1. कमीशन: 1970 में, राकेश शर्मा को भारतीय वायुसेना में एक टेस्ट पायलट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ।
  2. 1971 का युद्ध: मात्र 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध के दौरान उन्होंने मिग-21 (MiG-21) लड़ाकू विमान उड़ाकर अपने असाधारण साहस और कौशल का परिचय दिया।
  3. टेस्ट पायलट: उनकी बेहतरीन उड़ान क्षमताओं और तकनीकी ज्ञान को देखते हुए, भारतीय वायुसेना द्वारा उन्हें ‘टेस्ट पायलट’ के रूप में चुना गया। यह एक ऐसा पद होता है जिसमें नए और अपग्रेड किए गए विमानों का परीक्षण करना होता है, जो बेहद जोखिम भरा कार्य है।

उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारतीय वायुसेना का यह होनहार टेस्ट पायलट एक दिन भारत का पहला अंतरिक्ष यात्री बनकर देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करेगा।

अंतरिक्ष मिशन के लिए चयन (Selection for Space Mission)

1980 के दशक की शुरुआत में, शीत युद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक संबंध बेहद मजबूत थे। इसी समय सोवियत संघ ने अपने ‘इंटरकॉस्मोस’ (Intercosmos) कार्यक्रम के तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का प्रस्ताव रखा।

  • इसरो (ISRO) की भूमिका: 20 सितम्बर, 1982 को ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (ISRO) और सोवियत संघ की अंतरिक्ष एजेंसी के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
  • चयन प्रक्रिया: इस संयुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए भारतीय वायुसेना के कई बेहतरीन पायलटों का कड़ा परीक्षण किया गया। शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की लंबी और कठिन प्रक्रिया के बाद, अंतिम रूप से स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा को इस ऐतिहासिक मिशन के लिए चुन लिया गया।
  • बैकअप पायलट: उनके साथ विंग कमांडर रविश मल्होत्रा को भी बैकअप (वैकल्पिक) अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुना गया था।
राकेश शर्मा और उनके साथी | Rakesh Sharma

सोवियत संघ में कठोर प्रशिक्षण (Rigorous Training)

अंतरिक्ष में जाना कोई साधारण काम नहीं था। शून्य गुरुत्वाकर्षण (Zero Gravity), अंतरिक्ष यान के तकनीकी पहलू और सोवियत टीम के साथ संवाद करने के लिए राकेश शर्मा को कड़े प्रशिक्षण से गुजरना पड़ा।

  • स्टार सिटी मॉस्को: उन्हें सोवियत संघ के यूरी गगारिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर (स्टार सिटी), मॉस्को में भेजा गया।
  • भाषा का ज्ञान: रूसी अंतरिक्ष यात्रियों के साथ तालमेल बिठाने और अंतरिक्ष यान (Spacecraft) के मैनुअल पढ़ने के लिए राकेश शर्मा और रविश मल्होत्रा ने प्रतिदिन 6-7 घंटे रूसी भाषा (Russian Language) सीखी।
  • शारीरिक परीक्षण: उन्हें कठोर ‘सेंट्रीफ्यूज ट्रेनिंग’, आइसोलेशन चेंबर, और शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में रहने का अभ्यास कराया गया, ताकि उनका शरीर अंतरिक्ष के अमानवीय वातावरण को सहन कर सके।

2 अप्रैल 1984: ऐतिहासिक अंतरिक्ष उड़ान (The Historic Launch of Soyuz T-11)

वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जिसका पूरे भारतवर्ष को बेसब्री से इंतज़ार था। 2 अप्रैल, 1984 को सोवियत संघ (अब कज़ाकिस्तान) के बैकानूर कॉसमोड्रोम (Baikonur Cosmodrome) से सोयूज टी-11 (Soyuz T-11) अंतरिक्ष यान ने उड़ान भरी।

इस मिशन में कुल तीन अंतरिक्ष यात्री शामिल थे:

  1. विंग कमांडर राकेश शर्मा (भारतीय मिशन विशेषज्ञ और रिसर्चर)
  2. वाई. वी. मालिशेव (अंतरिक्ष यान के कमांडर, सोवियत संघ)
  3. जी. एम. स्ट्रकोलॉफ़ (फ़्लाइट इंजीनियर, सोवियत संघ)

सफलतापूर्वक लॉन्च होने के बाद, सोयूज टी-11 ने तीनों यात्रियों को सोवियत रूस के ऑर्बिटल स्टेशन सेल्यूत-7 (Salyut-7) में सुरक्षित पहुँचा दिया। यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक कूटनीतिक जीत थी।

सेल्यूत-7 स्पेस स्टेशन पर कार्य और प्रयोग (Experiments on Salyut-7)

राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में कुल 7 दिन, 21 घंटे और 40 मिनट का समय बिताया। यह कोई पर्यटन यात्रा नहीं थी, बल्कि एक बेहद व्यस्त वैज्ञानिक मिशन था। सेल्यूत-7 पर रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए:

1. वैज्ञानिक प्रयोग (33 Scientific Experiments)

अंतरिक्ष में सात दिन रहकर राकेश शर्मा ने बायो-मेडिसिन (Bio-medicine) और रिमोट सेंसिंग से जुड़े लगभग 33 वैज्ञानिक प्रयोग किए। इन प्रयोगों का उद्देश्य यह समझना था कि अंतरिक्ष के वातावरण का मानव शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है।

2. अंतरिक्ष में योग (Yoga in Space)

भारहीनता (Microgravity) से पैदा होने वाले असर (जैसे मांसपेशियों में कमजोरी और हड्डियों के द्रव्यमान में कमी) से निपटने के लिए राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में जीरो-ग्रेविटी योग (Zero-Gravity Yoga) का अभ्यास किया। ऐसा करने वाले वे दुनिया के पहले इंसान थे।

3. भारत की फ़ोटोग्राफी

राकेश शर्मा का काम रिमोट सेंसिंग से भी जुड़ा था। उन्होंने विशेष कैमरों की मदद से अंतरिक्ष से भारत और हिमालय क्षेत्र की शानदार तस्वीरें उतारीं। इन तस्वीरों ने भारत सरकार और इसरो को प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों, और मौसम के अध्ययन में काफी मदद की।

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” (The Iconic Conversation)

इस मिशन का सबसे भावुक और यादगार पल वह था, जब अंतरिक्ष स्टेशन ‘सेल्यूत-7’ से राकेश शर्मा ने मॉस्को और नई दिल्ली के साथ एक साझा संवाददाता सम्मेलन (Press Conference) किया। उस समय भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से सीधा संवाद किया।

जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा: “ऊपर से (अंतरिक्ष से) हमारा भारत कैसा दिखता है?”

तब बिना किसी हिचकिचाहट के राकेश शर्मा ने प्रसिद्ध कवि अल्लामा इक़बाल की ग़ज़ल की पंक्तियाँ दोहराते हुए कहा: “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” (Sare Jahan Se Achha Hindustan Hamara)

यह एक ऐसा गौरवपूर्ण क्षण था, जिसे दूरदर्शन (टेलीविज़न) पर करोड़ों भारतवासियों ने लाइव देखा और अपने जेहन में हमेशा के लिए संजो लिया। यह वाक्य आज भी हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर देता है और देशभक्ति की भावना से भर देता है।

पृथ्वी पर वापसी और बाद का जीवन (Return and Post-Space Life)

सफलतापूर्वक अपने सभी प्रयोगों को पूरा करने के बाद, 11 अप्रैल 1984 को राकेश शर्मा और उनके साथी सोयूज टी-10 (Soyuz T-10) यान के जरिए सुरक्षित पृथ्वी (कज़ाकिस्तान की धरती) पर लौट आए। भारत लौटने पर उनका किसी राष्ट्रीय नायक (National Hero) की तरह भव्य स्वागत किया गया।

हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) में कार्य

अंतरिक्ष यात्रा के बाद, वे भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं देते रहे और विंग कमांडर के पद से सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट के बाद वे रुके नहीं, बल्कि ‘हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड’ (HAL) में चीफ टेस्ट पायलट के तौर पर कार्य करने लगे।

  • एक भयानक हादसा (The Crash Survival): तेजस (LCA) जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में उनका बड़ा योगदान रहा। एचएएल (HAL) में काम करने के दौरान एक बार उनका लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त (Crash) हो गया था। यह उनके जीवन का सबसे खतरनाक पल था, लेकिन अपनी सूझबूझ और इजेक्शन (Ejection) सिस्टम की मदद से वे बाल-बाल बच गए।

इसरो और गगनयान मिशन में योगदान (Contribution to ISRO & Gaganyaan)

राकेश शर्मा का नाता अंतरिक्ष से कभी नहीं टूटा।

  • इसरो समिति के सदस्य: नवम्बर 2006 में, राकेश शर्मा ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (ISRO) की राष्ट्रीय सलाहकार समिति में सदस्य के रूप में शामिल हुए।
  • इसी समिति ने भारत के भविष्य के स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम (Gaganyaan Mission) के ब्लूप्रिंट को अनुमति दी थी।
  • वर्तमान में भारत जो गगनयान मिशन लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है (जिसमें 4 भारतीय एस्ट्रोनॉट्स अंतरिक्ष में जाएंगे), उसमें राकेश शर्मा के अनुभव और उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन का बहुत बड़ा योगदान है।

वर्तमान में, बेंगलुरु और तमिलनाडु के कुन्नूर में रहने वाले राकेश शर्मा ‘ऑटोमेटेड वर्कफ़्लो कम्पनी’ के बोर्ड चेयरमैन की हैसियत से भी जुड़े रहे हैं और आज एक शांत जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

सम्मान और पुरस्कार (Awards and Honors)

राकेश शर्मा के अदम्य साहस और भारत का नाम विश्व पटल पर रोशन करने के लिए उन्हें कई सर्वोच्च सम्मानों से नवाज़ा गया:

  • अशोक चक्र (Ashoka Chakra): भारत सरकार ने राकेश शर्मा और उनके दोनों सोवियत अंतरिक्ष साथियों (वाई. वी. मालिशेव और जी. एम स्ट्रकोलॉफ़) को शांति काल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया।
  • हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन (Hero of the Soviet Union): अपनी सफल अन्तरिक्ष यात्रा से वापस लौटने पर तत्कालीन सोवियत संघ ने उन्हें अपने देश के सबसे बड़े सम्मान ‘हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन’ से विभूषित किया। ऐसा सम्मान पाने वाले वे गिने-चुने विदेशियों में से एक थे।

निष्कर्ष : Rakesh Sharma Biography in Hindi

राकेश शर्मा (Rakesh Sharma) की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के अंतरिक्ष में जाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के उन सपनों के उड़ान भरने की कहानी है, जो आसमान से परे जाने की चाह रखते हैं। 1984 में उनके द्वारा उठाए गए कदम ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

आज जब ‘इसरो’ मंगलयान, चंद्रयान-3 और गगनयान जैसे मिशन सफलतापूर्वक कर रहा है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतरिक्ष में भारत का पहला ध्वज राकेश शर्मा ने ही फहराया था। उनका कहा गया वाक्य “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” आज भी हमारे कानों में गूंजता है और हमें भारतीय होने पर गर्व महसूस कराता है।

राकेश शर्मा के विषय में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री कौन थे?

भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा थे। उन्होंने 2 अप्रैल 1984 को अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी थी।

राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में कितने दिन बिताए थे?

राकेश शर्मा ने सोवियत स्पेस स्टेशन ‘सेल्यूत-7’ में कुल 7 दिन, 21 घंटे और 40 मिनट का समय बिताया था।

इंदिरा गांधी के पूछने पर राकेश शर्मा ने क्या जवाब दिया था?

जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तो राकेश शर्मा ने जवाब दिया था- “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा”।

राकेश शर्मा किस अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में गए थे?

राकेश शर्मा सोवियत संघ के अंतरिक्ष यान ‘सोयूज टी-11’ (Soyuz T-11) के जरिए अंतरिक्ष में गए थे।

अंतरिक्ष यात्रा के लिए राकेश शर्मा के साथ बैकअप (Backup) में किसे चुना गया था?

अंतरिक्ष यात्रा के बैकअप पायलट के रूप में भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर ‘रविश मल्होत्रा’ को चुना गया था। उन्होंने भी राकेश शर्मा के साथ सोवियत संघ में पूरा प्रशिक्षण लिया था।

राकेश शर्मा को भारत सरकार द्वारा किस सम्मान से नवाजा गया?

भारत सरकार ने उनके ऐतिहासिक योगदान और साहस के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया था।

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